Aranya Kand

अरण्य कांड (नवधा भक्ति का रहस्य)

नवधा भक्ति कहउँ तोहि याहिं। सावधान सुनु धरु मन माहिं॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरी रति मम कथा प्रसंगा॥

गुरु पद पंकज सेवा तीसरी भगति अमान।

चौथी भगति मम गुनगन करई कपट तजि गान॥

मंत्र जाप मम ढृढ़ विश्वसा। पंचम भजन सो वेद प्रकाशा॥

छठ दम सील विरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

सातवँ मम मोहि मय जग देखा। मोते संत अधिक करि लेखा॥

आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहीं देखई परदोषा॥

नवम सरल सव सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥

नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

क्रोध मनोज लोभ मद माया, छूटहिं सकल राम कि दाया॥

गुरुनानक देव जी की वाणी

 

सोरठी महला ३ ॥ भगति खजाना भगतन कउ
दिआ नाउ हरी धनु सचु सोइ॥ अखुटु नाम धनु
कड़े निखूटै नहि किनै न कीमति होइ॥ नाम धनि
मुख उजले होए हरि पाइआ सचु सोइ॥1॥ मन
मेरे गुर सबदी हरि पाइआ जाई ॥ बिनु सबदै जगु
भुलदा फिरदा दरगाह मिलै सजाइ॥ रहाउ॥ इसु
देही अंदरि पंच चोर वसहि कामु क्रोधु लोभु मोहु
अहंकारा॥ अमृतु लुटहि मनमुख नहि बूझहि
कोई न सुणै पूकारा॥ अँधा जगतु अंधु वरतारा
बाझु गुरु गुब्बारा॥2॥

Ram Ji Ram