Cow Protection

गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत। गावो भूतं च भव्यं च गावः पुष्टि च सनातनी॥
जगतगुरु शंकराचार्य
” गौ मनुष्यों के जीवन का अब्लम्ब है; गौ कल्याण का परम निधान है; पहले के मनुष्यों का ऐश्वर्य गौ पर अबलम्बित था, और आगे की उन्नति भी गौ पर ही अबलम्बित है। गौ समग्र पुष्टि का साधन है।”

उक्त कथन अक्षरसः सत्य है। जीवों का शरीर पंचभूतों से बना है और जीवन को पुष्ट करने तथा जीवन सुचारु रूप से चलाने के लिए पंचभूत आवश्यक है जिनमें दो कारक प्रधान हैं – 1. पृथ्वी 2. जलवायु (जल + वायु)। जनसँख्या की बेतहाशा वृद्धि, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण असंतुलित हो गया है जिसका असर मानव जीव जगत पर पड़ रहा है। फल असाध्य रोगों एवं महामारी के रूप में सामने आ रहा है। इसका समाधान गौ माता के पास है।

पृथ्वी में उपस्थित तत्त्व व योगिक जो जीवों के लिए आवश्यक व् स्वस्थ्य कारक हैं, आश्चर्य का विषय है की वे गौ माता के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी में उपस्थित हैं। और तो और पृथ्वी को मानव जीवन विकास कही जाने वाली प्रक्रिया द्वारा जहर दिया गया है उसको भी संतुलित करने में गोमूत्र और गोबर सक्षम हैं। मानव शरीर के असाध्य कहे जाने वाले कैंसर, डायिबटीज, हृदय रोग, तनाव, पेट के समस्त रोग, आँख-कान-त्वचा के रोग गौ माता के पंचगव्य तथा आयुर्व्रेद प्राकृतिक षट्क्रम विद्या द्वारा सही हो रहे हैं जिसका एलोपैथी में कुछ गंभीर रोगों का इलाज महंगा एवं जटिल है। अतः मानव को सुखसमय जीवन जीते हुए सात्विक भाव पर चलना होगा जो गौ सेवा से संभव है। प्रसनता का विषय है की अब लाखों कृषक गौ आधारित प्राकृतिक खेती को अपना कर निरोगी जीवन जीने का सेवा कार्य कर रहे हैं। हम भी प्राकृतिक जीवन जियें।

निवेदक: राम जी राम नीका पंथ (राम स्नेही ) ट्रस्ट, बरखेड़ा, पीलीभीत (उ० प्र० )

गौ वेद - रोग हरण

१. लक्ष्मीश्च गोमये नित्यं पवित्रा सर्वमङ्गला।
गोमयालयनं तस्मात् कर्तव्यं पांडुनंदनम॥

अर्थ: गोबर में परम पवित्रा सर्वमङ्गलमयी भी लक्ष्मी जी नित्य निवास करती हैं। इसलिए गोबर से लेपन करना चाहिए।

२. अनु सूर्यमुदयतां हृदयोतो हरिमा च ते।
जो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा पारी दध्मसि॥

अर्थ: सूर्योदय के होते ही तेरा हृदयदाहि रोग और पाण्डु रोग दूर हो जाते हैं लाल वर्ण की गौ के रंग से तुझे हम घेरे रखते हैं।

३. अन्धस्थान्धो वो भक्ष्मीया महास्या महो वो भक्षियोर्जस्थोर्ज।
वो भक्षीय रायस्पोषस्थ रायस्पोषं वो भक्षीय॥

अर्थ: हे गौओं, आप अन्न देने वाली हैं अतः आपकी कृपा से हम अन्न प्राप्त करें। आप पूज्यनीय हैं, आपके (गुण व पदार्थ सेवन + सेवा करना) सेवन से हममें सात्विक उच्च भाव पैदा होते हैं। आप बल देने वाली हैं, हमें भी आप बल प्रदान करें। आप धन देने वाली हैं, धन बढ़ाने वाली हैं अतः हमारे यहां धन की वृद्धि और शक्ति का आप संचार करें।

भावार्थ: पृथ्वी तथा गौ के गुण एक जैसे हैं, पृथ्वी में जितने तत्त्व व योगिक उपस्थित हैं सबके सब गौ के पंचगव्य में मिलते हैं। अतः गौ अन्न और शक्ति प्रदान करने के साथ चेतना में सतोगुण धारण कराती है।

गो-सूक्त

१. माता रुद्रानं दुहिता वसूनां स्वसादित्यनाममृतस्य नाभिः।
प्र न वोचं चिकितुषे जनाय माँ गामनागामदितिं वधिष्ट॥

अर्थ: गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, अदिति पुत्रों की बहिन और घ्रित रूप अमृत का खजाना है। प्रत्येक विचार शील पुरुष को मैंने यहीं समझकर कहा है की निरपराध एवं अवध्य गौ का वध न करो……………अर्थवेद।

२. आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्तसीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे।
प्रजावती पुरुरूपा इह स्युरिंद्राय पूर्वीरुषसो दुहानाः॥

अर्थ: गौओं ने हमारे यहां आकर हमारा कल्याण किया है। वे हमारी गौशाला में सुख से बैठे और उसे अपने सूंदर शब्दों से गुंजा दें। ये विचित्र रंगों की गौएँ अनेक प्रकार के बछड़े – बछड़ियाँ जनें और इंद्रा (परमात्मा) के यजन के लिए उषा काल से पहले दूध देने वाली हों।

३. न ता न शन्ति न दशाति तस्करो नासममित्रो व्यथिरा दधषति।
देवांश्च याभिर्यजते ददाति च जयोगित्ताभिः स च ते गोपतिः सह॥

अर्थ: वे गौवें न तो नष्ट हों, न उन्हें चोर चुरा के ले जाये, और न शत्रु ही कष्ट पहुँचाये। जिन गौओं की सहायता से उनका स्वामी देवताओं का यजन करने तथा दान देने में समर्थ होता है, उनके साथ वह चिरकाल तक संयुक्त रहे।

४. गावो भागो गाव इन्द्रो म इच्छाद गावः समस्या प्रथमस्य भक्षः।
इमा या गावः स जनस इंद्र इच्छामि हृदा मानसचिदिंद्रम॥

अर्थ: गौएँ हमारा मुख्या धन हों, इंद्रा हमें गो धन प्रदान करें तथा यज्ञों की प्रधान वास्तु सोमरस के साथ मिलकर गौओं का दूध ही उनका नैवेद्य बने। जिसके पास ये गौएँ हैं, वह तो एक प्रकार से इंद्रा ही है। मैं अपने श्रद्धायुक्त मन से गव्य पदार्थों के द्वारा इंद्र (भगवान) का यजन करता हूँ ।

५. यूयं गावो मेदयथा क्रिशम चिदधीरं चित कृणुथा सुप्रीतकम।
भद्रं ग्रहं कृणुथ भद्रवाचो वृहद्वो वे उच्च्यते सभासु॥

अर्थ: गौओं! तू कृष शरीर वाले व्यक्ति को हृष्ट – पुष्ट कर देती हो, एवं तेजहीन को देखने में सुन्दर बना देती हो। इतना ही नहीं, तुम अपने मंगलमय शब्दों से हमारे घरों को मंगलमय बना देती हो इसी से सभाओं में तुम्हारे ही महँ यश का गान होता है।

६. प्रजत्रती: सुयवसे रुशन्ति: शुद्धा अप: सुप्रपाणे पिबन्तीः।
मा च स्तेन ईशत माघशंस: परि वो रुद्रस्य हेतिवृणिवक्तु॥

अर्थ: गौओं, तुम बहुत से बच्चे जनो, चरने के लिए तुम्हे सूंदर चारा प्राप्त हो तथा सुन्दर जलाशय में तुम शुद्ध जल पीती रहो। तुम चोरों तथा दुष्ट हिंसक जीवों के चंगुल में न फंसो और रूद्र का शस्त्र तुम्हारी हर और से रक्षा करे। (…….अर्थवेद)

सर्वेषामेव भूतानां गावः शरणमुत्तमम।………धर्मशास्त्र
यद् गृहे दुःखिता गावः स याति नरके नर:।

अर्थ: सभी जीव गौ माता के ही शरण में हैं, जिस घर में गाय दुःखित होती है वह गृह स्वामी नरक गमी होता है।

धर्म ग्रंथों/ वेदों में गौ की महिमा

“धेनु सदानाम रईनाम” – अर्थवेद

गाय समृद्धि व प्रचुरता की द्योतक है ।


गौ द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तन धारी॥………..रामचरितमानस

रामचंद्र जी ने गौ, ब्राह्मण, देवता तथा गौवंश की समृद्धि एवं संरक्षण के लिए जन्म लिया था।

अवश्यं यतश्चितरमुषित्वापि विषया, वियोगी को भी दस्त्यजति न जनो यत्स्वय ममून।
व्रजन्त: स्वतंत्रयादतुलपरितापाय मनसः, स्वयं त्यक्ता ह्ये शमसुखमनन्तं विद्धाति॥

सांसारिक विषय एक दिन हमारा साथ छोड़ देंगे, यह एकदम सत्य है। उन्होंने हमको छोड़ा या हमने उनको छोड़ा, इसमें क्या भेद? दोनों एक बराबर है। अतएव सज्जन पुरुष स्वयं उनको त्याग देते हैं। स्वयं छोड़ने में ही सच्चा सुख है, बड़ी शांति प्राप्त होती है।

जिमि सरिता सागर महँ जांहि। जद्यपि ताहि कामना नाहिं॥
तिमि सुख सम्पति बुलाये। धर्मशील पहँ जाई सुहाये॥

जैसे सरिता (नदी) उबड़ – खाबड़, पथरीले स्थानों को पार करते हुए पूर्ण रूपेण निष्काम भाव से समुद्र में जा मिलती है। उसी प्रकार धर्म रथ पर आसीन मनुष्य के पास उसके न चाहते हुए भी समस्त सुख-सम्पति, रिद्धि सिद्धियाँ स्वतः आ जाती हैं, सत्य तो यह है कि वे उसकी दासिता ग्रहण करने के लिए लालायित रहती हैं ।


धर्माचरण कि महत्ता –
जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्यदेव का प्रकाश पड़कर भी भाषता नहीं है, उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर का प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है। अतः आसुरी प्रवृति वाला मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत दिव्या दृष्टि या दूर दृष्टि का अधिकारी नहीं बन सकता। अगर सद्गुरु कृपा द्वारा प्राप्त हो भी जाये तो वह उन्हें खो देता है।

युयं गावो भेद कृशं चीदक्षीरं चि कृणुथ सुप्रतिकमं ।
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहदो वय उच्यते सुभासु॥………अर्थवेद

निर्बल मनुष्य गौओं के दूध से बलवान व हष्ट-पुष्ट बनता है तथा फीका और निस्तेज मनुष्य तेजस्वी बनता है। गौओं से घर कि शोभा बढ़ती है। गौओं का शब्द बहुत प्यारा लगता है।

गाय कि महत्ता के वैज्ञानिक/ आर्थिक/ पर्यावरणीय कारण

1. बायो गैस (गोबर गैस): एक गोबर गैस प्लांट से सात करोड़ टन लकड़ी बचाई जा सकती है अर्थात साढ़े तीन करोड़ बृक्षों को जीवन दान। साथ ही तीन करोड़ टन उत्सर्जित होने वाली CO2 को रोका जा सकता है।

2. C .F .L द्वारा प्रकाश: कानपूर कि एक गौशाला ने शोध उपरांत एक ऐसा C .F .L बल्ब बनाया है जो गोमूत्र से चार्ज होने वाली बैटरी से जलता है। आधा लीटर गौ मूत्र से 28 घंटे C .F .L बल्ब जलता रहता है।

3. खाद: गोबर गैस प्लांट से निकली गोबर कि सेलरी से कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद बन जाती है।

4. गोबर: वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय के गोबर में B12 विटामिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो रेडियो धर्मिता को भी सोख लेता है। गाय के गोबर के कंडें का धुआं मचार भागने के काम आता है।

5. सींग: प्राकृतिक ऊर्जा प्राप्ति गाय सींगों द्वारा करती है, यह प्राकृतिक ऊर्जा हेतु एंटीना होते हैं। गाय कि मृत्यु हो जाने के 45 वर्ष बाद तक ये सुरक्षित बने रहते हैं। इसका प्रयोग सिलिकॉन खाद बनाने में किया जाता है।

6. गोमूत्र कीटनाशक: प्रकृति में मौजूद 99% किट-जीवाणु कृषि प्रणाली के मित्र हैं जिन्हें हमने जहरीले रसायनों द्वारा मार डाला है। गाय के गोबर + गोमूत्र + वनस्पतियाँ मिलकर बने कीटनाशक मित्र जीवाणुओं को नष्ट नहीं करते हैं। गोमूत्र या खमीर बने छाछ से बने कीटनाशक (एक गाय का) 100 एकड़ भूमि कि फसल कीटों से बचा सकता है और एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद दे सकता है। इस प्रकार भारत देश की 84 लाख एकड़ कृषि भूमि को वर्तमान में कत्लखानों से बची 40 करोड़ गौ वंश प्रयाप्त होगा।

7. मानव दवा: गोबर से चार्म रोगों का उपचारिय महत्व सर्वविदित है। प्राचीन काल में मकानों की दीवारों और भूमि को गाय के गोबर से लीपा पोता जाता था जिससे मजबूती के साथ मछर तथा कीटाणुओं तथा परजीविओं के हमलों को भी रोकता था। पूजा स्थल को गोबर से लीपने पर ही पवित्र मन जाता था।

Ram Ji Ram